मैं वो हूँ
मैं वो पानी सी हूँ, जो किसी मे भी घूल जाऊ. मैं वो हवा सी हूँ, जो आकाश मे घुम हो जाऊ. मैं वो रेत सी हूँ, जो किसी मे भी घूल जाऊ. मैं वो धूल सी हूँ, किसी पर भी जम जाऊ. मैं वो समुन्दर हूँ, कोई नाव की रफ़्तार न काट सके. मैं वो पर्वत हूँ, जो कभी झुक न सके. मैं वो लहर हूँ, जो तुम्हारे कदम चूमती र हू. मैं वो लहर भी हूँ, जो तुम्हे अपनी और खीच भी लू. मैं वो नदी हूँ, जो हर मोड़ में मु ड जाऊ. मैं वो पेड़ हूँ, जो हर पल फलों से लदी रहू. मैं वो पेड़ हूँ, जो तुम्हे नम्र और शीत छाया दूँ. मैं वो पेड़ हूँ, जो कट कर भी तुम्हारी सेवा मे लगी रहूँ. मैं वो दिया हूँ, जो खुद जलकर दूसरों का अँधेरा मिटा सकूँ. मैं वो सूरज हूँ, जो सबको प्रकाश दूँ. मैं वो चाँद हूँ, जो अंधेरे को मिटा दूँ . मैं वो तारा हूँ, जिसे दिशा दिखा सकूं. मैं वो पंछी हूँ, जो पंख पसारे आसमान को छूलूँ. मैं वो इन्द्रधनुष हूँ, जो एक ही पल मैं सबको खुश कर दू. मैं वो स्मित हास्य हूँ, जो बस खुशियाँ बसेर दू. मैं वो कश्ती हूँ, जो किसी तूफान से न डरूं. मैं वो पत्थर हूँ, जिसे तराशो तो भगवान् बन जा...